डकार क्यों आती है इसका रहस्य एवं महत्त्व

*डकार क्यों आती है इसका रहस्य एवं महत्त्व*


गोविंद शरण प्रसाद की वॉल से साभार


*हमारा पाचन तंत्र मुँह से शुरु होता है। मुँह में हम चबा-चबाकर खाते हैं। इसके बाद हमारे पाचन तन्त्र में भोजन चलते-चलते हजम होता है और अन्त में गुदा द्वार से मल को बाहर निकाल दिया जाता है। हमारे पाचन तन्त्र में मात्र एक जगह है हमारा अमाशय, मेदा (Stomach)जहाँ पर भोजन लगभग 5-6 घंटे के लिये रुकता है और हाजमे का काम होता है। यह थैलीनुमा है, जब सुबह-सुबह हम खाली पेट होते हैं तो अमाशय सिकुड़-सा जाता है और इसमें कुछ शुद्ध वायु रहती है। हम भूख का एहसास होने पर भोजन लेते है, और मुख से चबा-चबा कर भोजन लेते हैं। हमारा अमाशय भोजन से आधा भर जाता है तो अमाशय की शुद्ध वायु हमारे मुँह में आती है। इसको कहा जाता है- ‘तृप्ति डकार’। इस तृप्ति डकार द्वारा हमारा अमाशय यह चेतावनी देता है कि अब तृप्ति हो गई। क्योंकि अमाशय को आधा तो भरना होता है भोजन से और अमाशय का 1/4% भाग पाचक रसों (Digestive Juices) द्वारा भरना होता है। शरीर का नियम है कि हम जिस तरह का भोजन लेते है, हमारा शरीर उस भोजन को पचाने के लिये उसी तरह के पाचकरस छोड़ता है।*


*तरह-तरह के तेजाब (पाचकरस) अमाशय में जाकर भोजन को हजम करने में मदद करते हैं। अमाशय का 1/4 % हिस्सा खाली रहना चाहिए, क्योंकि अमाशय में भोजन हजम करने के लिये मंथन क्रिया (Machanical Action) होती है जो भोजन हजम करने में मदद करती है। जैसे कि अगर हम मुख को पानी से पूरा भर लेगें तो कुल्ला नहीं कर सकते और मटके को दही से पूरा भर लेंगे तो दही का बिलौना नहीं कर सकते। ठीक ऐसे ही अगर हम अमाशय को खाली नहीं छोड़ेंगे तो अमाशय में मंथन क्रिया नहीं होगी। परन्तु हम अमाशय की इस तृप्ति डकार द्वारा दी गई चेतावनी की परवाह नहीं करते। हम और अधिक खाते हैं, और अधिक खाने से जब हमारा अमाशय भोजन द्वारा पूरा भर जाता है तो जो थोड़ी बहुत शुद्ध वायु शेष बची होती है वह हमारे मुँह में आती है। इसको कहा जाता है ‘पूर्ण डकार’ |*


*इस ‘पूर्ण डकार द्वारा हमारा अमाशय हमें यह चेतावनी देता है कि वह पूरा भर गया अब भोजन को हजम करने में वह कोई मदद नहीं कर सकता । लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हो जाती। भोजन को हजम करने के लिये जो पाचक रस चाहिये थे, वे फिर भी निकलते हैं, क्योंकि यह शरीर का नियम है। उस तेजाब को। अमाशय में जाने के लिये जगह नहीं मिलती, क्येांकि अमाशय को तो हमने पहले ही पूरा भर लिया है। वह तेजाब अमाशय के ऊपर के भाग में भोजन नली में पड़ा रहता है। ऐसी अवस्था का व्यक्ति कहता रहता है कि उसको जलन (Acidity) होती है या उसके शरीर में तेजाब बनता है। बात आगे चलती है- अमाशय में जो भोजन ऊपर तक ठसाठस भर लिया उसकी दशा एक डिब्बीनुमा बर्तन में बन्द हो जाने जैसी हो जाती है। उस भोजन को पाचक रस नहीं मिलते और मंथन-क्रिया के लिये जगह भी नहीं मिलती। वह भोजन पड़ा—पड़ा सड़ना शुरु हो जाता है। भोजन जब सड़ता है तो उसमें गैस बनती है। गैस का कुछ भाग नीचे गुदा द्वार से बाहर निकलता है, जिसको हम पाद के रूप से अनुभव करते हैं और गैस का कुछ भाग अमाशय के ऊपर की तरफ मुँह से बाहर निकलता है। रास्ते में भोजन नली के अन्दर तेजाब पड़े होने के कारण गैस उस तेजाब के साथ मिलकर हमारे मुँह में आती है, जिसको हम कहते हैं ‘खट्टे डकार‘*


 
*खाते हम गुलाब जामुन हैं। हमें आने चाहियें मीठे डकार, किन्तु आ रहे हैं खट्टे डकार। जरा सोचिये..! अर्थात् अगर व्यक्ति | ‘तृप्ति डकार आते ही भोजन लेना बन्द कर दे तो उसे गैस और तेजाब का अनुभव नहीं होगा। अगर व्यक्ति तृप्ति डकार आने के बाद खाना बन्द नहीं करेगा तो जीवन भर गैस और तेजाब उसका पीछा नहीं छोड़ेगा! चाहे वह व्यक्ति जीवन भर ऐंटासिड (Antacid), चूर्ण वगैरह लेता रहे। संसार की लगभग 80% आबादी गैस और तेजाब के रोग से पीड़ित है।*


*उपरोक्त कहानी द्वारा तीन तरह की डकारों का वर्णन किया गया है। चौथे किस्म की डकार भी होती है जिसको कहा जाता है ‘भूख डकार’। भोजन लेने के लगभग पाँच-छ: घण्टे बाद हमारे अमाशय के द्वारा भोजन को नीचे छोटी आँत में धकेल दिया जाता है चाहे अमाशय में भोजन हजम हो या न हो। भोजन को पाँच-छ: घण्टे के अन्दर अमाशय से निकलना ही पड़ता है। जब हमारा अमाशय खाली हो जाता है तो वह दुबारा से सिकुड़ता है और उसमें से कुछ वायु हमारे मुँह में आती है। उसको कहा जाता है भूख डकार’ । इस भूख डकार की पहचान है इसमें किसी तरह की भी दुर्गन्ध या स्वाद नहीं होता। इसको अनुभव करते समय शरीर में विशेष किस्म का हल्कापन होता है। इसका नाम भूख डकार है, परन्तु इसका यह मतलब नहीं है कि डकार आने पर तुरन्त खाना शुरू कर दिया जाए । वास्तव में इस भूख डकार द्वारा हमारा अमाशय हमें यह कहना चाहता है कि आपने जो उसे हाजमें का काम दिया था उसको पूरा करके वह अभी-अभी खाली हुआ है। उसे अब कुछ समय के लिये आराम की आवश्यकता है। परिणाम स्वरूप भूख डकार आने के लगभग एक-दो घण्टे के बाद जब आपको कड़क भूख का एहसास हो तब खाना चाहिये।*


*संत तिरुवल्लुवर जी का अनुभव- “शरीर के लिये किसी भी दवाई की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। यदि हम इस बात का ध्यान रखें कि भोजन उसी समय किया जाए जब हमें निश्चित हो जाए कि पिछली बार का खाया हुआ भोजन अच्छी तरह से पच चुका है।”*


*उपरोक्त चार किस्म की डकारों में से दो तरह की डकारों (तृप्ति डकार और भूख डकार) का अनुभव हर एक स्वस्थ व्यक्ति को होना चाहिए अन्य दो तरह की डकारों (पूर्ण डकार और खट्टे डकार) का अनुभव बिलकुल नहीं होना चाहिए।*


*कुछ अभागे लोगों को तृप्ति डकार का अनुभव ही नहीं होता। आजकल ऐसा आमतौर पर देखा जाता है। सैद्धान्तिक रूप से हमें दिन में दो बार ही भोजन करना चाहिए । जब कि व्यक्ति दिन में तीन या चार बार भोजन लेता है या पूरे दिन बार-बार कुछ न कुछ खाता रहता है (Lunching & Munching all the time) | इस प्रकार उसका अमाशय चौबीस घण्टे फैला ही रहता है। उसको सिकुड़ने के लिये समय ही नहीं मिलता । परिणामस्वरूप उसके अमाशय की लचक (Elasticity) खत्म हो जाती है। ऐसी हालत में तृप्ति डकार का अनुभव नहीं होता*


*वास्तव में इस कहानी के माध्यम से यह बताया गया है कि हमें भोजन लेते समय थोड़ी भूख बाकी रख कर भोजन लेना बन्द कर देना चाहिए। जैसे कि जब हम भोजन लेना शुरु करते हैं तब शुरु–शुरु में हमें मालूम ही नहीं पड़ता कि पेट में कुछ जा रहा है। भोजन लेते समय जब पेट में मालूम पड़ना शुरु हो जाए, हल्का-सा भारीपन आ जाए तब तुरन्त भोजन छोड़ दें । हम अपने आपको भोजन की थाली से इस तरह अलग कर लें जैसे बछड़े को गाय के स्तनों से अलग किया जाता है।*


*डकारें रोकने के सबसे असरकारक घरेलु उपचार*


1. कत्था : कत्था लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग आधा ग्राम तक खुराक के रूप में लेने से डकारे आना बंद हो जाती हैं।
2. अजवायन : अजवायन, सेंधानमक, संचरनमक, यवक्षार, हींग और सूखे आंवले का चूर्ण बराबर लेकर अच्छी तरह पीसकर चूर्ण बना लें। 1 ग्राम चूर्ण सुबह-शाम शहद के साथ चाटने से खट्टी डकारे आना बंद हो जाती हैं।
3. सोंठ : लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग 1 ग्राम सोंठ का चूर्ण को देशी घी में भूनी हींग और कालानमक के साथ सुबह-शाम सेवन करने से डकार नहीं आती हैं।
4. बाजरे : बाजरे के दाने के बराबर हींग लेकर गुड़ या केले के साथ खाने से डकार में आराम मिलता है।
5. जीरा : 1 चम्मच पिसा हुआ जीरा सेंककर, 1 चम्मच शहद में मिलाकर खाना खाने के बाद चाटने से डकारों में लाभ होता है।
6. ढाक : ढाक (पलास) की गोंद लगभग आधा ग्राम से लगभग 1 ग्राम सुबह-शाम सेवन करने से लाभ होता है।
7. कुलिंजन : कुलिंजन लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग आधा ग्राम तक के टुकड़ों को मुंह में रखने या चूसने से पाचन से संबधी बीमारियां दूर होती हैं और मुंह में सुगन्ध आती है।
8. हींग : देशी घी में भुनी हुई हींग, कालानमक और अजवायन के साथ सुबह-शाम सेवन करने से डकार, गैस और भोजन के न पचने के रोगों में लाभ मिलता है।
9. दालचीनी : दालचीनी का तेल 1 से 3 बूंद को बतासे या चीनी पर डालकर सुबह-शाम सेवन करने से डकार और पेट में गैस बनने में लाभ पहुंचता है।
10. मरोड़फली : मरोड़फली के फल का चूर्ण लगभग 2 से 3 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम सेवन करने से डकार, अफारा (पेट में गैस) और पेट के दर्द कम होकर लाभ देता है।
11. नारियल : कड़वी नारियल की गिरी को खाना खाने के बाद खाने से खट्टी डकारें आना बंद हो जाती हैं।
12. ताड़ : ताड़ के कच्चे गूदे का पानी पीने से वमन (उल्टी) और उबकाई आना बंद हो जाती है।
13. पिस्ता : पिस्ता का सेवन करने से जी का मिचलाना और उल्टी में लाभ होता है।
14. मिश्री : मिश्री की चासनी में बेर की मींगी (गूदा) और लौंग को मिलाकर खाने से जी के मिचलाने में लाभ होता है।
15. धनिया : धनिया और भारंगी को पानी में पकाकर पिलाने से सूखी उल्टी आना रुक जाएगी।
16. जस्ता-भस्म : जस्ता-भस्म लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग, मिश्री और जीरा के साथ खाने से उल्टी और जी का मिचलाना बंद हो जाता है।
17. पोदीना : पोदीना और इमली को पीसकर उसमें सेंधानमक या शहद मिलाकर खाने से खट्टी डकारे और उल्टी आना शांत हो जाती है।
18. धनिया : यह कोई रोग नहीं है परन्तु यदि कभी लगातार खट्टी डकारे आने लगती है तो रोगी को बेचैनी होने लगती है और वह शीघ्र ही घबरा जाता है। पेट में जलन होती है और जबान सूखने लगती है। बार-बार डकार आने से खुश्की दूर हो जाती है और वायु के कारण पेट में गर्मी सी महसूस होने लगती है। सीने में जलन, अकड़न और मीठा दर्द होने लगता है। ऐसी दशा में पाचक औषधि काम करती है। इसके लिए थोड़ा सा पुदीना और थोड़ा सा सूखा धनियां, बड़ी इलायची, अजवायन और कालानमक इन सबको पीसकर या तो टिकिया बना लेते हैं या चूर्ण बना लेते हैं फिर इसे 2 घंटे बाद गर्म पानी से लेना चाहिए। थोड़ी देर में डकारे बंद हो जाएंगी।
19. मेथी : मेथी के हरे पत्ते उबालकर, दही में रायता बनाकर सुबह और दोपहर में खाने से खट्टी डकारे, अपच, गैस और आंव में लाभ होता है।
20. नींबू : बिजौरे नींबू की जड़, अनार की जड़ और केशर पानी में घोटकर रोगी को पिलाने से डकार और जुलाब बंद हो जाते हैं।
21. नौसादर : नौसादर, कालीमिर्च, 5 ग्राम इलायची दाना, 10 ग्राम सतपोदीना पीस लें, इसे आधा ग्राम लेकर प्रतिदिन 3 बार खुराक के रूप में पानी के साथ लेने पर खट्टी डकारे, बदहजमी, प्यास का अधिक लगना, पेट में दर्द, जी मिचलाना तथा छाती में जलन आदि रोगों से छुटकारा मिलता है।
22. नागरमोथा : पीपल, कालीमिर्च, हरड़, बहेड़ा, आमला, शुंठी, बायविडंग, नागरमोथा, चंदन, चित्रक, दारूहल्दी, सोनामक्खी, पीपलामूल और देवदारू को 50-50 ग्राम लेकर पीसकर बारीक चूर्ण बना लें, फिर मण्डूर को 400 मिलीलीटर गाय के मूत्र में अच्छी तरह पका लें। जब मण्डूर 50 ग्राम शुद्ध रह जाये तो इसमें उपरोक्त चूर्ण को मिलाकर गूलर के फल के समान गोलियां बना लें। इन गोलियों को रोगी को देने से डकारें आना बंद हो जाती हैं।
वन्देमातर


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*बार बार डकार आना होम्योपैथिक दवा*


नक्सवोमिका 3X, 30CH – डकार में कड़वा तथा खट्टा पानी आता है। खाने के बाद जी मिचलाता है, उल्टी करने की इच्छा होती है, पेट की वायु ऊपर की ओर आती है और छोटी पसलियों के नीचे से दबाव डालती है। इस औषधि के चरित्रगत लक्षण हैं – रोगी शीत-प्रकृति का होता है, ठण्ड सहन नहीं कर सकता, हरेक बात में मीन-मेख निकालने वाला (आर्सेनिक जैसा जो दीवार पर टंगी टेढ़ी पेंटिंग को तत्काल सीधा किए बिना चैन से नहीं रहता), बड़ा सावधान ओर ईर्ष्यालु, तनिक-सी बात पर क्रोधी हो जाने वाला, उत्तेजित हो जाना, नाराजगी, परेशान, दुखी । इसका रोगी प्रायः दुबला-पतला होता है और हर बात में जल्दबाजी करता है।


अर्जेन्टम नाइट्रिकम 3X, 30CH – ऊंचे-ऊंचे, अधिक मात्रा में, कष्ट-रहित डकार, फीके डकार। हर बार भोजन के बाद ऊंचे-ऊंचे डकार मानों पेट फूट जाएगा। पहले तो डकार अड़ा रहता है, अंत में डकार की वायु बड़े वेग से, बड़ी जोरदार आवाज से डकार में ही निकल पड़ती है। इस औषधि के चरित्रगत लक्षण हैं मीठे या मिठाइयों के लिए लिप्सा, हर काम में जल्दी; किसी बात की अप्रत्याशित आशंका कि कहीं ऐसा न हो जाए, कहीं वह आ न जाए इस तरह के विचित्र भय; ऊंची जगह से, मकान की मुंडेर पर खड़े होने से भय इत्यादि । रोगी ऊष्ण-प्रकृति का होता है। इन लक्षणों के साथ यदि पेट का अफारा हो, डकार आएं, तो यह औषधि लाभकर सिद्ध होगी।


पल्सेटिला 30CH, 200CH – संध्याकाल में पित्त के डकार आते हैं, ये कड़वे तथा खट्टे होते हैं, डकारों में पहले के खाये भोजन का स्वाद अनुभव होता है। इस औषधि का चरित्रगत लक्षण है। मुंह सूखा किंतु प्यास नहीं; रोगी को घी-चर्बी के पदार्थों के प्रति अरुचि होती है। वह मक्खन नहीं खा सकता । केक, पेस्ट्री, परांठा, रबड़ी, मलाई आदि खा ले तो पेट खराब हो जाता है। भूख नहीं, प्यास नहीं, कब्ज भी नहीं, सरल स्वभाव, बात कहने से झट मान जाता है, आसानी से रो पड़ता है, स्वभाव तथा लक्षण बदलते रहते हैं; ऊष्ण-प्रकृति का होता है, ठंडी तथा खुली वायु पसंद करता है, सबसे सहानुभूति चाहता है। हर काम को निश्चिंत होकर करता है और किसी भी काम में कभी जल्दबाजी नहीं करता।


कार्बो वेज 6X, 30CH, 200CH – रोगी का पेट इस हद तक गैस से भर जाता है कि पेट का ऊपर का हिस्सा फूल जाता है, पेट में जलन होती है, लगातार डकार आती रहती हैं, अपचन में डकारों के साथ पनीला आमाशय-रस मुंह में आ जाता है, अपच का रोगी होता है। रोगी घी-मक्खन, दूध पसंद नहीं करता, अर्जेन्ट नाइट्रिकम की तरह मीठा तथा नैट्रम म्यूर की तरह नमकीन पसंद करता है, उसे कॉफी की चाह अधिक होती है। इसका विशेष लक्षण यह है कि रोगी को डकारों से राहत मिलती है, यहां तक कि सिरदर्द, गठिया आदि का दर्द भी डकार आने से कम हो जाता है, रोगी हर समय डकारा करता है, जब देखो डकार । रोगी वायु का चाहने वाला होता है। इसका विलक्षण-लक्षण यह है कि रोगी अंदर से जलन महसूस करता है, किंतु बाहर त्वचा से उसे ठंड अनुभव होती है।


कार्बो एनीमैलिस 200CH – पेट के ऑपरेशन के बाद जब पेट वायु से फूल जाता है, तब औषधि की 200 शक्ति की एक मात्रा देने से ही जो चमत्कारी लाभ होता है, वह देखते ही बनता है। डॉ. क्लार्क का कथन है कि कार्बोवेज देने के बाद डकारों में यह औषधि लाभ पहुंचाती है; यदि वायु पेट से उठकर गले की नली में आ फंसे, तो इस से वायु डकार में निकल जाती है। कार्बोवेज के बाद का ऐनीमैलिस दिया जा सकता है।


सल्फर 30CH – भोजन के छोटे-छोटे टुकड़े डकारों में आते हैं, जो अत्यंत खट्टे होते हैं, उसमें यह लाभकारी है।


चायना 30CH – इसमें भी पेट में, केवल ऊपर के हिस्से में नहीं, समूचे पेट में वायु भर जाती है, डकारें आती हैं। पेट से कड़वा पानी ऊपर उठ आता है, किंतु इसके डकारों में रोगी को आराम नहीं मिलता, हिचकियां आती हैं, फलों का पाचन नहीं होता, फल खाने से कष्ट बढ़ जाता है।


ऐसाफेटिडा 3X, 30CH – ऊंची-ऊंची डकारें; वायु से नहीं निकलतीं, सब ऊपर को चढ़ती हैं; पेट से वायु (डकार) ऐसे निकलती है, जैसे बम छूट रहे हों, लगभग हर क्षण इतनी वायु कहां पैदा होती है यह समझा नहीं आता।


इपिकाक 6X, 30CH – जी मिचलाने के साथ तेज डकार आते हैं और मुंह से सेलाइवा निकलता है, वमन आ जाता है, वमन के साथ जीभ बिल्कुल साफ रहती है, वमन आने पर भी रोगी को राहत नहीं मिलती। उल्टी आने पर भी जीभ साफ रहना इसका विशेष लक्षण है।


कैमोमिला 30CH – डकार आने से पेट-दर्द बढ़ जाता है जो स्वयं एक विचित्र-लक्षण है। साधारण रूप से डकार आने से पेट दर्द में आराम आना चाहिए, इसमें उल्टी बाते होती है। मुंह सेलाइवा से भर आता है, वायु पेट में अटक जाती है। जो लोग दर्द को आराम से सहन कर लेते हैं, उनके लिए यह औषधि उपयुक्त नहीं है। यदि निर्दिष्ट औषधियों से लाभ होता न दिखे, तो उनके मध्य में इसे देकर देखना चाहिए।


फास्फोरस 30CH, 200CH – इसमें भी फोके डकार आते हैं, कभी-कभी खाये हुए पदार्थ की उछाली आ जाती है, पेट में जलन होती है, तेज प्यास होती है, किंतु रोगी ठंडा (बर्फीला) पानी पीना चाहता है या इससे उल्टा लक्षण भी हो सकता है। कुछ रोगी पानी को देखना तक नहीं चाहते, पानी के नाम से ही जी मिचलाने लगता है, स्नान करते हुए पानी को न देखे, इसलिए वह आंखें बंद कर लेता है। पानी पेट में पड़ा-पड़ा जब गर्म हो जाता है, तब पेट उसे रखती नहीं, उल्टी कर देता है। पेट में ठंड की इतनी चाह होती है कि पेट दर्द भी आइसक्रीम खाने या ठंडा पेय लेने से ठीक हो जाता है।


*बदहजमी में डकारों के साथ भोजन-नली में जलन और दर्द होता है। यह जलन पेट से ऊपर तक की भोजन-नली में होती है। इसका कारण पेट में अत्यधिक अम्ल का होना होता है इसकी कुछ प्रमुख औषधियां निम्नलिखित हैं :-*


चायना 30CH – इसमें सारा पेट वायु से भरा रहता है, खूब डकारें आती हैं, ये डकारें खट्टी भी हो सकती हैं। पेट की वायु से दर्द होता है, किंतु डकार आने पर थोड़ा-सा हल्कापन भी महसूस होता है।


कार्बो वेज 30CH – इसमें बुसे खाने जैसे डकार आते हैं, खट्टी डकारों की भी भरमार रहती है। रोगी की पाचन-क्रिया अत्यंत शिथिल होती है। पेट में ऊपर के हिस्से में वायु भरी रहती है।


अर्जेन्टम नाइटिकम 6X – रोगी को डकारें आती हैं, जी मिचलाता है, पेट में वायू भरी होने के साथ-साथ दर्द भी रहता है, भोजन-नली और छाती में भी जलन होती है।


लाइकोपोडियम 30CH – छाती में जलन के साथ खट्टी डकारें आती हैं, पेट फूला हुआ-सा महसूस होता है।


पल्सेटिला 6X, 30CH – इसमें रोगी को पेट दर्द की शिकायत रहती है, पेट में गड़बड़ी से ही पनीली डकारें आती हैं, छाती में जलन रहती है।


नक्सवोमिका 6X – डकार आने में कठिनाई, भोजन-नली में जलन, पनीली और खट्टी डकार, सवेरे के समय बासी डकारों की अधिकता।


ब्रायोनिया 6X, 30CH – भोजन के बाद कड़वी तथा खट्टी डकारें आती रहना, अम्ल के कारण छाती में जलन होती है, भारी-भारी डकार आती हैं, ठंडा पानी पीने की अधिक इच्छा होती है।


 


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