देश का प्रतिष्ठित संस्थान जेएनयू वामपंथी वर्चस्व का हो रहा शिकार

वैसे तो जेएनयू यानी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की राजनीतिक और वैचारिक विरोध की राजनीति का एक लंबा इतिहास रहा है और कई बार वह हिंसक भी हुआ, परंतु वर्तमान घटना सचमुच अप्रत्याशित और चिंतनीय है। दरअसल पांच जनवरी को हुई हिंसा जेएनयू में चल रहे प्रदर्शन की ही एक परिणति है। इस पूरे घटनाक्रम को समझने से इसके पीछे छिपी मंशा और दोषी तक पहुंचना आसान हो जाता है। लगभग करीब ढाई माह से हॉस्टल मैनुअल को लेकर कैंपस में जो प्रदर्शन जारी है उसमें कई ऐसे अवसर आए जब प्रदर्शनकारी संगठनों और सामान्य छात्रों के बीच हितों के टकराव की वजह से हाथापाई और गाली-गलौज तक की नौबत भी आई, लेकिन बात यहीं तक दब गई। परंतु कुछ दिनों बाद प्रदर्शनकारियों ने एक ऐसा रूप बदला जो जेएनयू इतिहास में शायद पहली बार था।


प्रदर्शनकारियों ने चेहरे पर नकाब लगाकर प्रदर्शन शुरू किया, जो स्पष्ट करता है कि प्रदर्शनकारियों को खुद भी इस बात का एहसास था कि वे जो भी कर रहे हैं वह अनैतिक और गैर-कानूनी है, जिस वजह से उन्हें अपनी पहचान छिपानी पड़ रही है। रजिस्ट्रेशन करने वाले छात्रों की बढ़ती संख्या को देख, और उन्हें समझा न सकने की असमर्थता से आहत ‘वाम गैंग’ ने नकाब पहनकर सर्वर रूम में घुसकर, वाइ-फाइ सिस्टम को ध्वस्त कर, अकादमिक भवन, लाइब्रेरी और आवासीय क्षेत्रों सहित पूरे कैंपस की इंटरनेट सुविधा को ठप कर दिया। इसी दौरान ‘नकाबधारी प्रदर्शनकारियों’ ने सेमेस्टर रजिस्ट्रेशन के लिए जा रहे एबीवीपी कार्यकर्ताओं और अन्य सामान्य छात्रों के साथ मारपीट भी की, उनके फॉर्म और मोबाइल भी छीन लिए। अपने आंदोलन से सामान्य छात्रों केघटते विश्वास और इतने लंबे आंदोलन को अपने हाथ से निकलता समझकर यूनियन पर काबिज एसएफआइ और आइसा ने उन स्टूडेंट्स को टारगेट करना शुरू किया जो रजिस्ट्रेशन कराने की कोशिश कर रहे थे।


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