दिल्ली चुनाव के चलते भाजपा सहित कोई भी पार्टी नहीं चाहती कि शाहीन बाग धरना हटे



नई दिल्ली। 




सीएए और एनआरसी के विरोध में पंद्रह दिसंबर से शुरू हुआ शाहीन बाग में महिलाओं और बच्चों का विरोध प्रदर्शन बुधवार को 39वें दिन में प्रवेश कर गया है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया के गेट पर छात्रों का प्रदर्शन बुधवार को जारी रहा। विरोध प्रदर्शन थमने की बजाय और उग्र होता जा रहा है और अब यह दिल्ली के खूंरेजी, सीलमपुर और जामा मस्जिद के साथ-साथ अन्य इलाकों में भी फैलता जा रहा है।

दिल्ली के साथ-साथ यह प्रदर्शन देश के अनेक हिस्सों में व्यापक रूप ले चुका है। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि केंद्र सरकार के किसी प्रतिनिधि को आकर उनसे बातचीत करनी चाहिए और कानून को लेकर उनका भ्रम दूर करना चाहिए। प्रदर्शनकारियों की इस मांग के बीच केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने लखनऊ में अपना स्टैंड दोहराते हुए कहा कि वे विरोध प्रदर्शनों से नहीं डरने वाले और सरकार यह कानून वापस नहीं लेगी।

दिल्ली के साथ-साथ पूरे देश में फैले इस माहौल के बीच दिल्ली विधानसभा का चुनाव अपनी तेजी पर आ गया है। माना जा रहा है कि यह मुद्दा दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रमुख मुद्दा बनकर उभर सकता है। इससे किसे फायदा होगा और किसे इसका नुकसान होगा, इसको लेकर अभी से आकलन शुरू हो गया है।

भाजपा को मतदाताओं के ध्रुवीकरण की उम्मीद


मनोज तिवारी ने बुधवार सुबह ही यह ट्वीट किया कि धरना 39वें दिन तक चल चुका है और इसकी वजह से स्कूली बच्चों, बीमारों और यात्रियों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने पूरा इतिहास खंगालते हुए राहुल गांधी के बयानों को मीडिया के सामने पेश कर दिया और कांग्रेस को ‘मुस्लिमपरस्त’ साबित करने की कोशिश किया।

अमित शाह ने ठीक एक दिन पहले लखनऊ में बयान दिया कि अयोध्या में राममंदिर तीन महीने के अंदर बनना शुरू हो जाएगा। भाजपा नेताओं के इन बयानों से स्पष्ट है कि वह अभी भी मतदाताओं के धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश में लगी हुई है। अगर ऐसा होता है तो उसे इसका फायदा मिल सकता है।

भाजपा के एक केंद्रीय नेता शाहीन बाग़ के विरोध प्रदर्शन के लिए कांग्रेस और वामपंथी दलों को जिम्मेदार ठहराते हुए यह स्वीकार भी करते हैं कि शाहीन बाग के विरोध प्रदर्शन के आगे बढ़ने से उन्हें फायदा ही होगा। उनका मानना है कि इस प्रदर्शन से लोग परेशान हो रहे हैं और वे इसके लिए कांग्रेस और आम आदमी पार्टी को सबक सिखायेंगे।

अगर भाजपा की यही रणनीति है तो वह इस आंदोलन को रोकने की बजाय और लंबा खींचने की कोशिश ही करेगी। प्रदर्शन के 39वें दिन के बाद भी आज तक किसी केंद्रीय नेता का प्रदर्शनकारियों से बातचीत के लिए न जाना उसकी इसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

कांग्रेस और आप में अल्पसंख्यक वोटों की दावेदारी


यह आंदोलन सीधे तौर पर अल्पसंख्यक मतदाताओं के गुस्से को दिखाता है। लिहाजा इससे अल्पसंख्यक वोटर लामबंद हो सकता है। दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चोपड़ा कहते हैं कि अल्पसंख्यक समाज यह देख रहा है कि उसके हक की लड़ाई कांग्रेस ने ही लड़ी है।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी ही उसके पास तक पहुंच रहे हैं और उनकी आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर उठा रहे हैं। जबकि आम आदमी पार्टी नेता उसकी आवाज को बुलंद करने की तो बात छोड़िये, वे शाहीन बाग़ जैसे स्थलों पर जाने से भी डर रहे हैं।

चोपड़ा का दावा है कि इस परिस्थिति में कांग्रेस ही उसकी स्वाभाविक पसंद बनकर उभरेगी। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अपना खोया वोट बैंक वापस पाया है। यही वजह है कि उसके हौंसले बुलंद हैं।

लेकिन अल्पसंख्यक मतदाताओं के वोटिंग पैटर्न को ध्यान से देखने वाले चुनाव विशेषज्ञ मानते हैं कि अल्पसंख्यक मतदाताओं के सामने लोकसभा चुनाव के दौरान राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य था, जिसके लिए आम आदमी पार्टी की तुलना में उसने कांग्रेस को अहमियत दी।

लेकिन मौजूदा चुनाव दिल्ली की सत्ता के लिए है, जहां उसे लोकल राजनीति को ध्यान में रखते हुए वोट देना है। यहां भाजपा को रोकने के लिए उसके पास आम आदमी पार्टी ही विकल्प बन सकता है।

इसके आलावा आम आदमी पार्टी की सरकार ने अल्पसंख्यक समाज को देखते हुए कई योजनाएं भी पेश की हैं जिसने उन्हें लाभ पहुंचाया है। इन परिस्थितियों में आम आदमी पार्टी इन वोटरों को लुभा सकती है।