जम्‍मू कश्‍मीर से 370 के खात्‍मे के बाद कनिहामा के लोगों को जगी है नई उम्‍मीद

श्रीनगर । श्रीनगर से करीब 16 किलोमीटर दूर है बडगाम जिले का गांव कनिहामा। सुर्खियों से परे इस गांव के कारीगर अपने हुनर से कश्मीर की अनूठी हस्तकला को न केवल आगे बढ़ा रहे हैं वरन दुनियाभर में नई पहचान देने की मशक्कत में जुटे है। कश्मीरी कालीन और पश्मीना की चकाचौंध के आगे इनकी कानी शॉल गुमनामी में कहीं खो गई पर न इनका विश्वास डगमगाया और न इन्होंने अपने हुनर से किनारा किया। अब 370 के खात्मे के बाद अब इस गांव में भी उम्मीद की रोशनी जगी है कि इन्हें भी विकास के साथ कदमताल करने का भरपूर अवसर मिलेगा।


लोगों को बेहद कम जानकारी 


कानी शॉल के बारे में काफी कम लोग ही जानते हैं। इसकी गुणवता पश्मीना शॉल से भी कई गुना अधिक है। एक कानी शॉल की कीमत 30 हजार से चार लाख रुपये तक है। चीरू भेड़ की ऊन से बनने वाली शॉल की बारीक कढ़ाई और डिजाइन गढ़ने में एक कारीगर को लगभग एक से डेढ़ साल लग जाता है। यह शॉल वजन में हलकी होती है जबकि इसकी गर्माहट काफी अधिक होती है। बुनकरों का गांव कहा जाने वाले कानीहामा की बड़ी आबादी इसी पर ही निर्भर है। गांव में महिलाओं की संख्या अधिक है।


गुंड कारहामा


कानीहामा की पहचान भी कानी शॉल से ही है। इसका असली नाम गुंड कारहामा था, लेकिन कानी शॉल की बदौलत गुंड कारहामा का नाम कानीहामा पड़ गया। इस गांव में जेके स्टेट हैंडलूम का कारखाना है और इसके अलावा कुछ अन्य लोगों ने यहां हैंडलूम खोले हैं। इनके माध्यम से गांव के कारीगर इस हुनर को बढ़ाने में जुटे हैं।


कानी शॉल आम हस्तकलाओं से अलग है। यह शॉल कानी यानी विशेष प्रकार के पेड़ की पतली टहिनयों पर बुनी जाती है। कानी को पहले पैंसिल की शक्ल दी जाती है। इसके लिए अलग से कारीगर होते हैं। बाद में कानी हथकरघे पर चढ़ाए पशमीने के धागों में घुसाई जाती है और शॉल बुनने की प्रक्रिया शुरू की जाती है। यह शॉल दूसरे बुने जाने वाले शॉलों से अलग होता है। एक कानी शॉल को बुनने के लिए 25-30 कानियों की दरकार होती है। इनकी मदद से शॉल पर कारीगर विभिन्न रंगों के डिजाइन बनाते हैं। यह डिजाइन कानी शॉल बुनने वाला कारीगर बनाता है।


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