निद्रा के सामान्य नियम

 


जिन्हें वीर्य रक्षण करना है, आरोग्य-सम्पन्न बनना है तथा जो स्वयं की शीघ्र उन्नति चाहते हैं, उन्हें जल्दी सोने और जल्दी जागने का अभ्यास अवश्य ही करना चाहिए। रात्रि में 9 से 12 बजे के बीच हर एक  घण्टे की नींद 3 घण्टे की नींद के बराबर लाभ देती हैं।  12 से 3 बजे के बीच प्रत्येक घण्टे की नींद डेढ़ घंटे की नींद के बराबर है। 3 से 5 बजे के बीच प्रत्येक 1 घंटे की नींद 1 घंटे के बराबर एवं 6 बजे अथवा सूर्योदय के बाद की नींद आलस्य, तमोगुण वर्धक है, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। रोगी और शिशु के अतिरिक्त किसी को भी छः घण्टे से ज्यादा कदापि नहीं सोना चाहिए। अधिक सोने वाला कभी भी स्वस्थ व प्रगतिशील नहीं हो सकता। प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में (सूर्योदय से सवा दो घंटे पहले) ही जाग जाना चाहिए क्योंकि वीर्यनाश प्रायः रात्रि के अन्तिम प्रहर में ही हुआ करता है। प्रातः काल हो जाने पर सूर्योदय के बाद भी जो पुरूष बिस्तर पर ही पड़ा रहता है वह तो अभागा ही है। इतिहास और अनुभव हमें स्पष्ट बतलाते हैं कि ब्रह्ममुहूर्त के दिव्य अमृत का सेवन करने वाले व्यक्ति ही महान कार्य करने में सफल हुए हैं।


जिन कमरों में दिन में सूर्य का प्रकाश पहुँचता हो तथा रात्रि में स्वच्छ हवा का आवागमन हो, ऐसे स्थानो पर शयन करना लाभदायक है। चादर, कम्बल, रजाई आदि से मुँह ढककर सोना हानिकारक है क्योंकि नाक और मुँह से कार्बन डाई ऑक्साइड गैस निकलती है जो स्वास्थ्य पर बुरा असर डालने वाली गैस है। मुँह ढके रहने पर श्वसन-क्रिया द्वारा यही वायु बार-बार अन्दर जाती रहती है और शुद्ध वायु (आक्सीजन) न मिलने से मनुष्य निश्चय ही रोगी और अल्पायु बन जाता है।


ओढ़ने के कपड़े स्वच्छ, हलके और सादे होने चाहिए। नरम-नरम बिस्तर से इन्द्रियों में चंचलता आती है, अतः ऐसे बिस्तर का प्रयोग न करें। रात्रि में जिन वस्त्रों को पहनकर सोते हैं, उसका उपयोग बिना धोये न करें। इससे बुद्धि मंद हो जाती है। अतः ओढ़ने, पहनने के सभी वस्त्र सदा स्वच्छ होने चाहिए। रजाई जैसे मोटे कपड़े यदि धोने लायक न हों तो कड़ी धूप में डालना चाहिए क्योंकि सूर्य के प्रकाश से रोगाणु मर जाते हैं।


दिन में सोने से त्रिदोषों की उत्पत्ति होती है। दिन काम करने के लिए और रात्रि विश्राम के लिए है। दिन में सोना हानिकारक है। दिन में सोने वाले लोगों को रात्री में नींद नहीं आती और बिस्तर पर पड़े-पड़े जागते रहने की स्थिति में उनका चित्त दुर्वासनाओं की ओर दौड़ता है।


सोने से पहले पेशाब अवश्य कर लेना चाहिए। सर्दी या अन्य किसी कारणवश पेशाब को रोकना ठीक नहीं, इससे स्वप्नदोष हो सकता है।


सोने से पूर्व ठंडी, खुली हवा में टहलने या दौड़ने से तथा कमर से घुटने तक का सम्पूर्ण भाग और सिर भीगे हुए तौलिये या कपड़े से पोंछने से निद्रा शीघ्र आती है।


सोने से कम-से-कम एक-डेढ़ घण्टा पहले भोजन कर लेना चाहिए। रात्रि में हलका भोजन अल्प मात्रा में लें। रात्रि में सोने से पूर्व गरम दूध पीने एवं खाने के बाद तुरंत सोने से स्वप्नदोष की संभावना बढ़ जाती है, अतः ऐसा न करें।


सोते समय सिर पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर रहना चाहिए।


निद्रा के समय मन को संसारी झंझटों से बिल्कुल अलग रखना चाहिए। रात्रि को सोने से पहले आध्यात्मिक पुस्तक पढ़नी चाहिए। इससे वे ही सतोगुणी विचार मन में घूमते रहेंगे और हमारा मन विकारग्रस्त होने से बचा रहेगा अथवा तो मंत्रजप करते हुए, हृदय में परमात्मा या श्रीसदगुरूदेव का ध्यान चिन्तन करते हुए सोयें। ऐसी निद्रा भक्ति और योग का फल देने वाली सिद्ध होगी।


उठते समय नेत्रों पर एकाएक प्रकाश न पड़े। जागने के बाद हाथ धोकर ताम्रपात्र के जल से नेत्रों को धोने से नेत्रविकार दूर होते हैं।