सर्वथा निष्काम भाव होने पर ही कल्याण संभव - स्वामी रामसुखदास जी महाराज

ॐ श्री परमात्मने नमः


भक्तों की जिज्ञासा और स्वामी रामसुखदास जी महाराज का समाधान


प्रश्‍न‒सत्संगमें सुना है कि ‘एक गिलास पानी भी निष्कामभावसे पिला दे तो कल्याण हो जायगा’, फिर अन्य साधन करनेकी क्या जरूरत है ?


स्वामीजी‒कल्याण क्रियासे नहीं होता, निष्कामभावसे होता है । यदि निष्कामभावकी महत्ता समझमें आ जायगी तो फिर मनुष्य सकाम भाव से कर्म कर सकेगा ही नहीं । एक राजा ने किसी व्यक्ति से कहा कि यह हीरे की खान है, यह सोने की खान है, यह चाँदी की खान है, यह कोयले की खान है । इनमेंसे जो चाहे सो ले लो । उसने हीरेकी खान ले ली, पर साथमें थोड़ा कोयला भी ले लिया कि भोजन पकानेके काम आयेगा । विचार करें, एक हीरेमें कितना कोयला आ सकता है, फिर कोयला लेनेकी क्या जरूरत ? यदि वह हीरेकी महत्ता समझ जाय तो कोयला कैसे लेगा ? इसी तरह मनुष्यको निष्कामभावकी महत्ता समझमें आ जाय तो फिर वह सकामभावसे कर्म कैसे करेगा ? यदि सकामभावसे कर्म करता है तो वास्तव में उसने निष्काम भाव को समझा ही नहीं है । अतः सर्वथा निष्काम भाव होने पर ही कल्याण होगा ।


प्रश्‍न‒कामना और आशामें क्या फर्क है ?


स्वामीजी‒‘मिल जाय’‒यह इच्छा है और ‘मिल जायगा’‒यह आशा है ।


दुःखका प्रभाव होनेसे सुखकी इच्छा, आशा और भोग तीनों मिट जायँगे । आशा मिट जाय, भोग रहे नहीं और इच्छा पूरी नहीं हो तो दुःख होता है । तीनोंमें मूल है‒सुखकी इच्छा । जिसकी इच्छा नहीं होती, उसके अभावका दुःख नहीं होता । इच्छासे ही अभाव होता है और अभावसे ही दुःख होता है ।


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