विवेक को मुख्यता न देकर श्रद्धा-विश्वास को मुख्यता देनी चाहिए - स्वामी रामसुखदास जी महाराज

                 🍁 *विचार संजीवनी* 🍁


आपको एक मार्मिक बात बताता हूँ। ध्यान देकर सुनना । एक विवेक शक्ति होती है। मनुष्य की जो महिमा है, वह विवेक से ही है। विवेक के कारण ही वह मनुष्य है। यह विवेकशक्ति बहुत ऊंची है; परन्तु इस विवेकशक्ति को परमात्मा की प्राप्ति में लगा दें तो जल्दी प्राप्ति नहीं होगी ! कारण कि विवेक से हम जड़का त्याग करते हैं । त्याग करने से त्याज्य वस्तु (जड़) की सत्ता बहुत दूर तक रहती है, जिससे जल्दी उद्धार नहीं होता। इसलिए विवेक को मुख्यता न देकर श्रद्धा-विश्वास को मुख्यता देनी चाहिए।  श्रद्धा-विश्वास की मुख्यता होने पर बहुत जल्दी उद्धार हो जाएगा।  विवेक की मुख्यता होने से कभी मन ठीक लगेगा, कभी नहीं लगेगा। कभी अपनी स्थिति बढ़िया दिखेगी, कभी नहीं दिखेगी। परन्तु श्रद्धा-विश्वास होने पर दो बातें नहीं होगी। अगर विवेक की परवाह न करके श्रद्धा-विश्वासपूर्वक भगवान के शरण हो जाए तो बहुत जल्दी काम होगा। 


भक्ति में सब परमात्मा हैं, त्याज्य वस्तु कोई है ही नहीं। जड़ भी परमात्मा हैं। जड़ भगवान की अपरा प्रकृति और चेतन परा प्रकृति है (गीता ७। ४-५)। अपरा को भगवान समझोगे तो जल्दी काम होगा और त्याग करोगे तो देरी लगेगी। जबतक जढ़ की सत्ता रहेगी तब तक परमात्मा की प्राप्ति नहीं होगी। *अगर यह विचार हो जाय कि सब परमात्मा है तो बहुत जल्दी सिद्धि हो जाएगी।*


भोग तथा संग्रह का त्याग करने के लिए तो विवेक बढ़िया है पर परमात्मा की प्राप्ति के लिए विवेक बढ़िया नहीं है ।  परमात्मा की प्राप्ति के लिए विश्वास बढ़िया है । *भोग तथा संग्रह के त्याग में 'विवेक' प्रधान है और परमात्मा की प्राप्ति में 'विश्वास' प्रधान है।* आप अपने मां-बाप को विश्वास से मानते हैं, विवेक से नहीं।  मां-बाप को मानने में विवेक काम नहीं करता। 


राम !             राम !!            राम !!!


परम् श्रद्धेय स्वामी जी श्रीरामसुखदास जी महाराज
*परमप्रभु अपने ही महुँ पायो*, पृ. सं ४०


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